पढें, कोयले की कालिख के बीच रहकर भी बेदाग रहने वाले नेता एके राय की संक्षिप्त जीवन यात्रा..

Bokaro, Jharkhand, News, write-up

राजनीति एक ऐसा दलदल है जिससे शायद ही कोई एक पाक साफ निकल आये और वो एक शख्स थे मार्कसिस्ट चिंतक श्री एके राय| धनबाद लोकसभा क्षेत्र से तीन बार सांसद रहे कॉमरेड एके राय ने अपना पूरा जीवन सादगी के साथ गुजार लिया| आज तक उनकी छवि पर भ्रष्टाचार और गलत कामों का कोई भद्दा दाग नहीं लगा| अपने आप में सबसे अलग, सबसे ईमानदार और जनता के प्रति कार्यबद्ध रहने वाले नेता एके राय का आज निधन हो गया| वो कुछ दिन पहले से अस्पताल में भर्ती थे जहां उनका इलाज चल रहा था|

चलिए एक नज़र डालते हैं श्री एके राय के संक्षिप्त जीवन यात्रा पर| एके राय का जन्म 15 जून 1935 को बंगाल के राजशाही जिले के सापुरा गांव (अब बांग्लादेश का हिस्सा है) में हुआ था। बंटवारे के वक्त श्री राय का परिवार कोलकाता आ गया| श्री राय का बचपन, पढ़ाई-लिखाई सब कोलकाता में हुआ| साल 1959 में कोलकाता विश्वविद्यालय से केमकिल इंजीनियरिंग की ड्रिग्री हासिल करने के बाद राय ने सिंदरी खाद कारखाना में बतौर इंजीनियर नौकरी शुरू की। इसके बाद वो धनबाद के हो कर रह गये औऱ इसे ही अपनी कर्मभूमी बना ली|

श्री राय ने अपनी निजी जिंदगी के बारे में कभी सोचा ही नहीं और शायद ही कारण है कि उन्होंने शादी नहीं की। वो ताउम्र मजदूरों और सर्वहारा की लड़ाई लड़ते रहे। एक समय ऐसा था कि इलाके में एके राय की तूती बोलती थी। उनके मजदूर आंदोलन और माफिया विरोधी अभियान की देश-विदेश में ख्याति थी। और इसके बाद उन्होंने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से राजनीति में कदम रखा।

श्री राय ने पहली बार बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ा और सिंदरी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीते। उन्होंने तीन बार सिंदरी विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया| देश में लगे आपातकाल के दौरान राय को भी जेल में डाल दिया गया था जिसके बाद 1977 में उन्होंने धनबाद जेल से ही पहली बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लोकसभा चुनाव लड़ा और जीते भी| इसके बाद उन्होंने 1980 और 1989 में भी चुनाव जीत कर धनबाद लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया।

श्री एके राय मजदूरों का प्रतिनिधित्व तो करते ही थे साथ ही उन्हीं की तरह सादगीपूर्ण जीवन जीते थे। आपको बता दें कि वो टायर की चप्पल पहनते थे ताकि वो जल्दी घीसे नहीं और ज्यादा दिनों तक चले। ये बात किसी को भी हैरान कर सकती है क्योंकि तीन बार सांसद रहने वाला शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा जो ऐसी जिंदगी व्यतीत करता हो| जिस जमाने में बड़े ओहदे पर बैठे अधिकारी भी अकड़ में लाल बत्ती के साथ चलते हैं उस भीड़ में एके राय बिलकुल अलग नजर आते हैं।

ये उनकी महानता ही है कि जहां लगभग हर नेता अपनी सुख-सुविधा को बढ़ाने के लिए बेताब रहते हैं वहां उन्होंने सांसद के रूप में पेंशन और अन्य सुविधाएं लेने से भी इन्कार कर दिया था। वो अकेले ऐसे सांसद थे जिन्होंने सांसदों को दी जानेवाली सुविधाओं का विरोध किया था|

खपड़ैल की छत वाले, बिना बिजली के घर में जिंदगी गुजार देनेवाले लोकप्रिय राय दा के राजनैतिक विरोधी भी उनके प्रशंसक रहे हैं| वामपंथी विचारक के रूप में पहचान रखने वाले राय दा अंग्रेजी अखबारों में लेख भी लिखा करते थे।

माकपा से अलग होकर श्री राय ने अपनी पार्टी मार्क्सवादी समन्वय समिति (एमसीसी) बनाई थी। हालांकि, उनका मजदूर संगठन बिहार कोलियरी कामगार यूनियन सीटू से संबद्धित है। दशकों पहले कोयलांचल सहित देश के मजदूर आंदोलन में राय दा का दबदबा रहा है। कोयलांचल में मजदूर आंदोलन के नाम पर पहलवानों के जोर से ठेकेदारी और चंदाखोरी करनेवालों को राय दा के आंदोलन के कारण ही बैकफुट पर आने को विवश होना पड़ा था।

70 के दशक में राय दा ने शिबू सोरेन और बिनोद बिहारी महतो के साथ मिलकर झारखंड को अलग राज्य बनाने के आंदोलन को नए सिरे से गति दी थी। झामुमो के गठन में श्री राय का महत्वपूर्ण योगदान रहा है हालांकि कि किन्हीं मतभेदों की वजह से उन्होंने झामुमो का दामन छोड़ दिया| आज शायद पूरा राज्य इसलिए शोकाकुल है क्योंकि झारखंड तो क्या, देश के किसी कोने में शायद ही ऐसा ईमानदार नेता मिलेगा |

Leave a Reply