चंद्रपुरा: कॉपरेटिव सोसाइटी बैंक में जमा गरीबों का पैसा लेकर भागे लोनधारक..

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आज देश की हालत ऐसी है कि यहां गरीब और गरीब होता जा रहा और अमीर…अमीर बनता जा रहा है| लेकिन बुरा तब लगता है जब ये अमीर, गरीबों का दमन करके उनके ही पैसों से अमीर बन जाते हैं| कुछ ऐसा ही हुआ है चंद्रपुरा के झरनाडीह स्थित रांगामाटी (दक्षिणी) पैक्स यानि कि कॉपरेटिव सोसाइटी बैंक में|यहां अपनी खून-पसीने की कमाई को जिस उम्मीद में लोगों ने जमा कराए थे, अवधि पूरी होने पर वहीं पैसा ब्याज के साथ जब वापस लेने का समय आया तो बैंक वालों ने कह दिया की बैंक में पैसे ही नहीं है| तो आखिर ये पैसे गए कहां?

दरअसल, गरीब तबके के लोगों ने तिनका-तिनका जोड़कर इस बैंक में अपना खाता खुलवाया था| इनमें मुख्यत: फिक्स्ड डिपाजिट खाता थे जिससे कुछ ब्याज भी कमाने की उम्मीद थी| इन पैसों को बैंक ने लोन के तौर पर बड़े-बड़े रसूखदारों जैसे कि नामचीन डॉक्टर, राजनीति से प्रेरित लोग, पार्षद और मुखिया आदि को सौंपा, जो कि हर बैंक की एक आम प्रक्रिया है| उम्मीद थी कि ये लोन धारक ब्याज समेत लोन का पैसा चुकाते रहेंगे और इससे गरीबों का पैसा भी सुरक्षित रहेगा और उन्हें ससमय भुगतान होता रहेगा| लेकिन हुआ इसके ठीक विपरित| रसूखदारों ने बैंक को लोन का पैसा लौटाया नहीं और बैंक ने असमर्थता जाहिर करते हुए उन गरीबों का पैसों का भुगतान किया नहीं|

आलम ये है कि अब ये लोग अपने पैसे के लिए बैंक के चक्कर काट रहे हैं और रसूखदार उनके पैसों पर मौज कर रहे हैं| कुछ लोगों ने साल 2002 से लिया हुआ लोन अबतक चुकता नहीं किया है| बैंक वालों का कहना है कि उनके पास पैसे है ही नहीं कि लोगों को वापस किया जाए| सबसे ज्यादा मार नोटबंदी के दौरान पड़ी, जब करीब 6 महीने तक एक पैसा भी नहीं आया| यहां कोई ऑनलाइन भुगतान नहीं होता, सारा लेन-देन नगद में होता है| तो नोटबंदी के दौरान लोनधारकों ने पैसे जमा ही नहीं कराए| हालांकि कहीं नहीं कहीं उन लोनधारकों की मंशा पैसे वापस करने की है ही नहीं|

बैंक वालों का कहना है कि उनके द्वारा लोनधारकों पर कार्रवाई करते हुए एफआईआर भी किया गया लेकिन उसका भी कोई नतीजा निकला नहीं| उधर लोगों का कहना है कि उन्होंने सालों तक यहां पैसे इस उम्मीद में जमा कराए थे कि जरूरत पड़ने पर ये पैसे काम आ सके| लेकिन बैंक आने पर उन्हें खाली हाथ ही लौटना पड़ता है| ये सिलसिला कई साल से चलता आ रहा है| बैंक वाले आज-कल का हवाला देकर टाल जाते हैं, और तो और लोगों से बचने के लिए बैंक के मैनेजर भी नदारद हो जाते हैं|लोगों के सब्र का बांध अब टूटता जा रहा है| ऐसे में मंगलवार को बैंक के बाहर लोगों की भीड़ जुटी लेकिन एक बार फिर मैनेजर गायब रहे|

बोकारो अपडेट्स की टीम ने बैंक के बाहर मौजूद लोगों से बातचीच कि तो उनका दर्द सामने आया| तपती हुई गर्मी में बुजुर्ग सुरेश तिवारी अपना पैसा लेने बैंक आये लेकिन उन्हें बैंक वालों ने ये कह कर भेज दिया कि बैंक में पैसे ही नहीं है| श्री तिवारी ने बताया कि साल भर हो गये, फिक्स्ड डिपाजिट की अवधि समाप्त भी हो गई लेकिन पैसे अबतक नहीं मिले|

वहीं अपने बीमार पति के ईलाज के लिए सुचिता देवी 3 साल से बैंक के चक्कर काट रही है लेकिन हर बार निराश, खाली हाथ लौटना पड़ता है| उन्होंने बताया कि 3 साल से बैंक वाले कह रहे कि पैसे मिल जाएंगे लेकिन अबतक कुछ भी नहीं मिला|हर बार किसी ना किसी बहाने टाल दिया जाता है|मैनेजर तारीख देकर बुलाते हैं पर खुद गायब हो जाते हैं|

हद तो तब हो गई जब बैंक वाले अपना पैसा लेने आये इन गरीब लोगों को ही मारने की बात करते हैं| अपना और अपने मां के नाम पर जमा कराए हुए पैसे निकालने के लिए जब विश्वजीत साहू बैंक पहुंचे तो उन्हें मारने की धमकी देकर बैंक से बाहर जाने को कहा गया|

वहीं एक सज्जन ने बताया कि उन्होंने मेहनत करके कमाए हुए पैसे सालों तक यहां जमा कराए जो लाख रूपये तक के करीब हो गये थे| लेकिन अवधि समाप्त हुए डेढ़ साल हो गए और अबतक 100 रूपया भी नहीं मिला|

कितनी विडंबना है, गरीबों के पैसों पर रसूखदार खुद की इमारते खड़ी कर रहे हैं| माल्या औऱ नीरव मोदी तो काफी बड़े नाम हैं लेकिन इन छुपे हुए रसूखदारों का क्या जो गरीबों का पैसा हजम करने में जुटे हुए हैं| वोट के लिए कोई सलाना 72 हजार देने की बात करता है तो कोई कालेधन को खत्म करने की बात कहता है| लेकिन क्या इस समस्या की ओऱ किसी जनप्रतिनिधि का भी ध्यान जाएगा? इन अमीर लोगों से गरीबों का पैसा वापस लेने के लिए क्या कोई नेता सामने आएगा? देखना ये होगा कि चुनावी जुमलों को दरकिनार कर क्या वाकई में कोई इनकी मदद के लिए सामने आता है या नहीं|

 

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