जाने, मकर संक्रांति में क्या है तिल का महत्व..

Festival, write-up

ठंड के दस्तक देते ही बोकारो शहर की फिजाओं में गुड़ औऱ तिल की भीनी-भीनी खुशबू घुल जाती है| चास-बोकारो के किसी भी मार्केट, सेक्टर, और गली से गुजरते हुए ये सौंधी महक आपको दुकानों तक खींच लाती है जहां लोग तिलकुट का स्वाद लेने रूक जाते हैं| यहीं वजह है कि आजकल सिटी सेंटर, विभिन्न सेक्टर, चीरा चास और चास का कुंवर सिंह चौक के तिलकुट दुकानों पर काफी भीड़ देखने को मिल रही है|

15 जनवरी को मकर संक्रांति भी है और इसमें तिल और गुड़ का विशेष महत्व है| लोगों द्वारा इस दिन पूजा-पाठ में होने वाले दान की चीजों में तिल अनिवार्य रूप से शामिल होता है| तिल छुने और दान करने को लेकर कई तरह की मान्यताएं हैं| माना जाता है कि मकर संक्रांति के दिन काले तिल से सूर्य की पूजा करने से धन और धान का लाभ मिलता है| वहीं एक मान्यता ऐसी भी है कि सूर्य देव सभी अनाजों का पोषण करते हैं और हमें अच्छी फसल देते हैं, इसी का आभार व्यक्त करने के लिए हम मकर संक्रांति के दिन तिल ,चावल ,खिचड़ी आदि का चढ़ावा चढ़ाते हैं|

तिल के कई स्वास्थ्य लाभ भी है| आजकल की भाग दौड़ वाली जिंदगी में तिल एंटीडिप्रेसेंट्स का काम करते हैं साथ ही कैल्शियम, आयरन, जिंक, मैग्निशियम, सेलेनियम से भरपूर तिल हमारे बॉडी को फिट रखता है| इसके एंटीकैंसर प्रॉपर्टी से हृदय, किडनी, लिवर से जुड़े कैंसर के प्रभाव को कम किया जा सकता है| यहां तक कि बाल झड़ने या फिर सफेद बाल से बचने के लिए तिल बेहद असरदार माना जाता है|

कहा जाता है कि जनवरी की ठंड को पीछे छोड़ते हुए सूर्य भगवान सूर्य उत्तरायण होते हैं, तब नई फसलों के साथ तिल भी हमारे आंगन में खिल जाता है| अच्छी फसलों की खुशी में लोग इसे त्योहार की तरह मनाते हैं| हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों में ये त्योहार विभिन्न तरीके से मनाया जाता है तथा इसके नाम भी अलग हैं| कहीं मकर संक्रांति के रूप में ‘तिल-तिल बही दे देना’ कहकर माताएं अपने बच्चों से तन, मन, धन ,से सेवा का भरोसा मांगती हैं,तो कहीं लोहड़ी की आग में रेवड़ी, मूंगफली डालकर लोग ‘तिल चटके जाड़ा छिटक’ गीत गाकर बदलते मौसम के लिए तैयार होते हैं| कोई पोंगल की धूम में रमा है तो कोई बिहू का आनंद उठा रहा होता है| कहीं संकष्टी चतुर्थी के व्रत में तिल गुड़ और शकरकंद को चढ़ाकर को गणेश जी को मनाया जाता है तो कोई गंगासागर में स्नान करके पुण्य कमा रहा होता है| दूसरी तरफ कोई पूष मेला खत्म होने पर अपनी दुकान समेट रहा होता है, तो कोई माघ मेला के लिए दुकान सजा रहा होता है|त्योहार एक ही है बस उसे मनाने के तरीके विभिन्न प्रकार के हैं और उसी अनुरूप उनके नाम है|

अब इंतजार किस बात का है, जैसा कि मराठी में कहावत है ‘गोड़-गोड़ खा आनी, गोड़-गोड़ बोल’ यानी कि तिल गुड़ खाओ और मीठा बोलो|

Leave a Reply